सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ से सम्बंधित अपने देश की करोडो जनता की समस्याओ को उजागर करने के लिए मैंने अपना प्रयास इस साल अपने पुत्र श्री ज्ञानसागर अधिवक्ता उच्च न्यायालय के सहयोग से श्री कृष्ण भगवान के जनम दिन यानि २ सितम्बर २०१० दिन ब्रहस्पतिवार को आरम्भ किया है
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिभर्वति भारत। अभ्युत्थानामाधार्मास्य तदात्मानं स्र्र्जाम्यहम ॥
देश की करोडो जनता के दुखदर्द पीड़ा और कलेश के विरुद्ध लड़ते हुए मैंने अपने जीवन के पचास बरससे भी अधिक का समय बिताया है जिस संघर्ष के लिए मुघे केवल इतनी ख़ुशी है की इंसान के नाते मैंने अपने ही भईयो के दुःख दर्द पीड़ा अन्याय से जुडी समस्याओ को हल करने में जो समय बिताया है उस के लिए मुझे अपने जीवन पर संतोष है चुकी मै भी उन करोडो लोगो में से एक हूँ इस लिए अब मै बहुत अकाटय सत्य से सम्बंधित अभिलेखो के साथ अपने जनम स्थली की सत्यता को अपने पाठको के सामने रखने जा रहा हूँ मेरी जनम स्थली को जो लोग भ्रस्ट्राचार से जो लोग मुक्ति दिलाने के लिए मुझे सक्रिय सहयोग दे रहे है उन के प्रति मै सर्वप्रथम आभार प्रकट करते हुए उन्हें धन्यवाद दे रहा हूँ ।
मै गोरखपुर के वरिष्ठ पुलिस अधिक्षक जिन्हें में सबसे पहले अपनी जनम स्थली को बैमानो से मुक्ति दिलाने में सहयोग देने के लिए राजघाट पुलिस थाना को जाँच कर के रिपोर्ट देने का आदेश दिया उन्हें बधाई देना चाहता हूँ जिन के आदेश के बाद मुझे पता चला की मेरे मकान को किस प्रकार फर्जी जाली बैनामा जो संपत्ति अंतरण अधिनियम १८८२ की धारा ५४ के विरुद्ध है के सहारे मकान का मालिक बन कर चैन से रह रहे है ।
पुलिस थाना राजघाट ,गोरखपुर के जाँच अधिकारी श्री रमाकांत यादव को भी धन्यवाद दे रहा हूँ जिन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिछ्क गोरखपुर के आदेश दिनांक १२ मई २००७ के बाद मकान संख्या १८७/१६७ (रोज प्रिंटिंग प्रेस के बगल में )अलहदादपुर की जाँच कर के अवैध कब्जेदारो का बयान लेकर वास्तविक स्थिति से मुझे अवगत कराया है ।
श्री रमाकांत यादव ने अपने रिपोर्ट दिनांक १७.०५.२००७ के द्वारा मुझे सूचना दिया की मेरे मकान को हड़प कर स्वयं को मकान मालिक बता कर रह रहे लोगो सर्व श्री गंगादेवी पत्नी स्वर्गीय योगेन्द्र नाथ मिश्रा उन के पुत्रो सर्व श्री राजेश कुमार मिश्रा ,जयप्रकाश मिश्रा ,ने जो जाँच के समय मेरे आवेदन पत्र के अनुसार बयान दिया है उक्क्त बयान के अनुसार उन लोगो ने मकान के मालिकान अधिकार के सम्बन्ध में कोई पंजीकृत बयनामा ,वसीयत या अन्य कागजात नहीं दिखाए अपने द्वारा मेरे नाम पर जमा किये गए गृहकर से सम्बंधित रसीद आदि ही दिखाया ।
जो तथ्य रमाकांत यादव ने लिखे है उसे पढ़कर मुझे यह विधिक जानकारी और शक्ति मिली जिस के आधार पर मैंने आगे बढ़ने की कार्यवाही आरम्भ किया ।
३ जून १९३६ को मकान संख्या १४६,(वर्तमान समय में )१८७/१६७ (रोज प्रिंटिंग प्रेस के बगल में )अलहदादपुर गोरखपुर में मेरा जनम हुआ मेरे स्वर्गीय पिता गोविन्दराम जो ओ .टी.रेलवे में कार्य करते थे जिन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन के संघर्षो से प्रभावित होकर ३१ दिसम्बर १९४२ को सरकारी नौकरी छोड़ दिया जो कुछ ग्रेचविटी का लाभ मिला उस से परिवार का पालन पोषण किया उन की म्रत्यु १० जनवरी १९५० को हो गई पिता की म्रत्त्यु के बाद मेरे जीवन के कठिनाइयों से लड़ने का अद्ध्याय खुल गया मैं अपनी इच्छानुसार पढ़ कर जो बनना चाहता था वह सब सपना समाप्त हो गया रोटी के संघर्षों के कारण मुझे जगह जगह भटकना पड़ा जो मेरे लिए किसी विश्वविद्यालय की पढाई से कम नहीं था संयोगवश मुझे सिसवा बाजार के डा० दिवाकर प्रसाद पांडे की कृपा से महात्मा गाँधी पुस्तकालय की नौकरी मिल गई जिस पुस्तकालय ने मेरे जीवन और चिंतन तथा संघर्षों के नए दरवाजे खोल दिए पुस्तक गुरु से ऐसी मुलाकात हुई जिसने अब तक मेरी ज्ञान की भूख को इतना बढ़ा दिया की लगता है जीवन के अंतिम सासों तक अपने पुस्तक गुरु से सम्बन्ध बना रहेगा पुस्तक गुरु के सम्बन्ध में ही मुझे देश के महानतम विद्वान राहुल सक्र्त्यान से सम्पर्क ही नहीं कराया बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में आत्म विश्वाशी बना दिया पुस्तक गुरु की कृपा से पत्रकार लेखक विधि परामर्शी तथा आज जो कुछ भी हूँ यह पुस्तक गुरु की ही कृपा से हूँ। हिंदी ब्लित्त्ज ,जनयुग ,सोसिलिस्ट मनोरमा आदि में मुख्य रूप से लेखन करता रहा प्रसिद्द फिल्म लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ,विश्व प्रसिद्द लेखक श्री किशनचंदर ,राजीवसक्सेना,रमेश सिन्हा ,मुनिव सक्सेना,आदि की छत्रछाया में और कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
१२ फ़रवरी १९९६ को जब में लकवा ग्रस्त हो गया उस समय "अग्निदीच्छा "के लेखक निकालाई अर्स्त्रो वस्त्की की तथा प्रोफेसर हव्किंग्स की पुस्तको ने जीवन के लिए मौत से लड़ने की शक्ति प्रदान किया । लकवा ग्रस्त होने के बाद से अब तक मैंने अनेको पुस्तके लिखी किन्तु एक आर्थिक रूप से संपन्न प्रकाशक नहीं बन सका ।
मुझे बड़े भाई के सामान विष्णु प्रभाकर जी का ऐसा आशीर्वाद मिला की लिखने में कभी दिन या रात में फर्क ही नहीं मालूम पड़ता है सूचना का कानून आते ही मैंने सबसे पहले उस पर अपने ही मामले में प्रयोग शुरू किया मैंने सर्वप्रथम गोरखपुर पुलिस विभाग को अपने मकान के मामले में कार्यवाही शुरू किया । मेरे मकान संख्या १८७/१६७ के सम्बन्ध में नगर निगम के इन्तखाब पर मेरा घरेलू नाम लक्ष्मण प्रसाद पुत्र श्री गोविन्द राम दर्ज है । मैंने दिनांक ४अप्रैल १९८५ को पंजीकृत पत्र नगर महापालिका गोरखपुर को लिख कर भेजा की मेरा नाम लक्ष्मण प्रसाद के स्थान पर लक्ष्मण खैरवाल कर दिया जाये तथा जो भी बकाया कर ३१मार्च १९८५ तक बनता है उस का बिल मेरे पते पर भेज दिया जाय ताकि में कर का भुगतान कर सकू ।
इस पत्र के प्राप्ति के बाद मुझे बकाया कर अदा करने के लिए कोई सूचना पजीकृत पत्र द्वारा नहीं दिया गया अपने मकान का गृह कर मैंने २.११.८८ को जमा जिस की रशीद संख्या १००४ नगर निगम द्वारा छाया प्रतिलिपि मुझे सुचना अधिनियम के शिकायत के दौरान दिया गया।
मैंने सुचना का अधिकार अधिनियम २००५ की धारा ३ और ७ के अंतर्गत २९.०७.०६ को बीस रूपये का बैंक ड्राफ्ट ५ अभिलेशो के साथ जिलाधिकारी गोरखपुर को पंजीकृत डाक के साथ भेज कर मकान संख्या १८७/१६७ के सम्बन्ध में सूचना दिए जाने की प्रार्थना किया ।
जब २९.०७.०६ के पत्र का कोई उत्तर नहीं आया तो मैंने पुनः ३०.१०.०६ को जिलाधिकारी गोरखपुर को पत्र लिख कर सूचना दिए जाने की मांग किया किन्तु हमारे पत्र दिनांक ३०.१०.०६ का भी जब कोई जवाब नहीं आया तो मैंने सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत नियुक्त उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग को ४ दिसम्बर २००६ को शिकायत प्रस्तुत कर दिया जिस शिकायत पर राज्य सूचना आयोग,उत्तर प्रदेश ,लखनऊ ने १०.०१.०७ को दोनों पक्ष को नोटिस जारी करते हुए शिकायत की सुनवाई १९.०१.२००७ की तारीख निश्चित कर दिया तथा शिकायत को मुक़दमा संख्या ३८१३/०६ के रूप में पंजीक्रत किया गया १९.०१.२००७ को सुनवाई राज्य सूचना आयुक्त श्री ज्ञानेंद्र शर्मा जी के सम्मुख आरम्भ हो गया। १९.०२.०७ को श्री डॉ.के. गुप्ता जी के समक्ष प्रतिवादी पक्ष की तरफ से गोरखपुर जिलाधिकारी की तरफ से श्री मोहम्मद इश्तिहार तथा मेरी तरफ से मेरी पुत्री सुश्री सुमन खैरवाल अधिवक्ता ,उच्च न्यायलय को जिन अभिलेशो की छाया प्रतिलिपि दिया उस की तो हम कल्पना ही नहीं कर सकते थे । वास्तव में २००५ से अब तक सूचना का अधिकार की आंधी इतनी तेजी से बह रही थी की बड़े बड़े भ्रस्त्ताचारी अधिकारी तक सोचते थे पता नहीं इस कानून के अंतर्गत सूचना आयुक्त्त कौन सा आदेश दे दे। जिस से उन का भविष्य खतरे में आ जाये । शिकायत करता द्वारा चाही गयी सभी सूचना तत्काल वादी पक्ष को उपलब्ध करा दे रहे थे । अब तक सूचना आयोग के कार्यालय में भ्रस्ट्राचार का दीमक नहीं घुस पाया था।
मेरी पुत्री सुश्री सुमन खैरवाल को नगर निगम की तरफ से प्रमाणित अभिलेश (१)संपत्ति अंतरण अधिनियम १८८२ की धरा ५४ के विपरीत फर्जी बैनामा जिस के द्वारा मुझे अपने मकान को पाच हजार रूपये में स्वर्गीय योगेन्द्रनाथ मिश्रा पुत्र श्री रामप्यारे मिश्रा से १७.०२.७१ को बेचा जाना दिखाया गया था। इस अभिलेश को जो हमारे मकान संख्या १८७/१६७ का बेचा जाना दिखाया गया था उस के एक एक रूपये के पीछे किस स्टाम्प वेंडर से यह एक एक रूपये का जनरल स्टाम्प किस तारीख को खरीदा गया था कोई विवरण नहीं लिखा गया है । प्रत्येक एक एक रूपये के पाच स्टाम्प पेपर पर गवाह स्वर्गीय मंगरू तथा रामसमुझ के अंगूठा की निशानी लिए गए थे जब की मेरा नाम फर्जी लिखा हुआ है जबकि फर्जी मेरे नाम के साथ अंगूठा निशानी भी लिया जाना जरुरी था। १७.०२.७१ को जिस दिन यह फर्जी बैनामा लिखा जाना दिखाया गया है उस दिन में लखनऊ में ऑटो मोबाइल प्रोडक्ट ऑफ़ इंडिया के कर्मचारी श्री रमेशचंद्र के विवाद में लखनऊ लेबर कोर्ट के समक्ष उपस्थित था।
फर्जी बैनामा की लिखावट भी विधि के अनुसार नहीं है तथा उत्तर प्रदेश में तो संपत्ति अंतरण अधिनियम १८८२ की धारा ५४ के अंतर्गत एक सो रूपये से अधिक की मल्कियत का पंजीकरण कानून के अनुसार बहुत ही आवश्यक है । इस फर्जी बैनामे के साथ नगर निगम मेरे द्वारा ०२.११.८८ को ४७ रूपये ५२ पैसे जमा किये जाने की रसीद ... कंप्यूटर द्वारा १३६रुप्यै ८० पैसा का बिल इन्तखाब की नक़ल जिस के कालम ५ पर रामप्यारे मिश्रा को १५ रूपये माह पर किरायेदार दिखाया गया है कर निरीक्षनं सूची साल १९८४-८५ जिस में १९.१२.९६ को उप समिति द्वारा नाम संशोधन किये जाने का प्रस्ताव दिखाया गया है ।
मेरे बड़े भाई श्री राम द्वारा मकान का तालाबंदी जो गत ३ साल से बंद था खुलवाने का आवेदन पत्र के अनुसार कार्यवाही की नक़ल जिस में श्री योगेन्द्र नाथ मिश्रा द्वारा ३१.०१.५४ को लघु न्यायलय के आदेश अनुसार ३०/-रुपया जमा किया जाना दिखाया गया है सी पी श्रीवास्तव सिटी मजिसट्रेटने आदेश दिया है की किरायदार योगेन्द्रनाथ मिश्रा को मकान का ताका खोल कर रहने और सफाई आदि करने का आदेश दिया गया है।
यह आदेश ०७.०८.६२ का है जिस में यह भी कहा गया है की श्री योगेन्द्रनाथ मिश्रा ने कहा की मकान विवाद ग्रस्त होने के सम्बन्ध में किसी अभिलेश को बार बार मांगे जाने के बाद भी नहीं दिखाया गया है सिटी मजिसट्रेट के आदेश तथा ०२.११.८८ के गृहकर जमा किये जाने की रसीद के साथ श्री लक्ष्मण प्रसाद के नाम २४.०९.८३ को ४१५रुपया ८० पैसा टैक्स के रूप में जमा करने की छाया प्रतिलिपि तथा कम्पूटर द्वारा २३.०२.८९ को मेरे नाम लक्ष्मण प्रसाद के नाम निकाली गई नोटिस की प्रतिलिपि भी दिया गया है ।
सबसे बड़े ताज्जुब की बात यह है की जब योगेन्द्र नाथ मिश्रा ने मेरे मकान को १७.०२.७१ को खरीद लिया था फिर उन्होंने मेरे नाम से २४.०९.८३ को ४१५ रूपये ८० पैसा का टैक्स क्यों जमा किया ?
१७.०२.७१ के बैनामा को जब की में १२ फ़रवरी १९९६ को लकवा ग्रस्त हो गया उस के बाद ही यानि १९.१२.९६ को ही क्यों प्रस्तुत तथा सुविधा शुल्क के आधार पर मेरा नाम कटवा कर श्री मति गंगा देवी और उन के पुत्रो सर्व श्री राजेशकुमार ,जैप्रकास, तथा प्रेम प्रकास का नाम ०१.१०.९६ से दर्ज करा लिया। मैंने राज्य सूचना आयोग के समक्ष दिनांक २०.०४.२००७ को जो आवेदन पत्र दिया उस पत्र में मैंने अपने नाम लक्ष्मण खैरवाल (लक्ष्मण प्रसाद)पुत्र श्री गोविन्दराम के नाम बकाये कर का विवरण भेजने के लिए पंजीक्रत पत्र के द्वारा मांग किया था ।
मेरे पत्र दिनांक २३.०५.०७ के सम्बन्ध नगर निगम ने जो भ्रामक उत्तर २६.०५.०७ को दिया है उसी से यह बात स्पस्ट हो जाता है की टाईटील निस्तारण का कार्य जब न्यायलय द्वारा किया जाता है फिर किस आधार पर नगर निगम ने न्यायलय के अधिकार छेत्र को अपने हाथ में लेकर मेरे नाम को ०१.१०.९६ से काट कर उनके नाम पर दर्ज कर दिया था।
२४.०७.०७ को माननीय राज्य सूचना आयुक्त के समक्ष वादी के पुत्र श्री विद्या सागर एव प्रतिवादी की ओर से श्री वीके दुबे नगर आयुक्त उपस्थित हुए तो राज्य सूचना आयुक्त ने प्रतिवादी को आदेश दिया था की २० दिन के अन्दर वादी का प्रतिउत्तर का उस के प्रश्नों के अनुसार दे दे । परन्तु आज प्रतिवादी आयोग के समक्ष उपस्थित हुआ है और न ही उसने वादी को कोई सूचना उपलब्ध कराई है अत: प्रतिवादी श्री वी के दुबे ,नगर निगम ,गोरखपुर को चेतावनी दी जाती है की उन्होंने यदि १५ दिन के अन्दर वादी को सभी सूचनाये उपलब्ध न कराई तो उन के विरूद्ध सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ की धारा २० के तहत २५० रूपया प्रतिदिन का दंड आरोपित किया जायेगा। वाद वास्ते अगली सुनवाई दिनांक २० अगस्त २००७ को पेश हो ।
उप नगर आयुक्त गोरखपुर ने पत्रांक ७२१/३.न. आ./0७-0८/कर/जो.न.१ दिनांक १३.०८.०७ के द्वारा अन्य तथ्यों के अतिरिक्त अंत में लिखा है मुकदमे का निर्णय आप माननीय न्यायलय से कराये सक्षम माननीय न्यायलय द्वारा जो निर्णय किया जायेगा तदनुसार नगर निगम द्वारा अग्रिम कार्यवाही किया जायेगा ।
२०.०९.०७ को राज्य सूचना आयुक्त श्री वी के सक्सेना जी समक्ष हुई कार्यवाही का आदेश
वादी श्री विद्या सागर एवं सुश्री सुमन खैरवाल उपस्थित हुए। प्रतिवादी की तरफ से कोई उपस्थित नहीं हुआ है। पिछली तारीख दिनांक २४.०७.०७ को प्रतिवादी की ओर से श्री वी के दुबे नगर आयुक्त नगर निगम गोरखपुर उपस्थित हुए थे वादी ने उन्हें अपना प्रत्युत्तर बना कर आयोग के समक्ष सौपा था । प्रतिवादी को निर्देश दिया गया था की वह २० दिन के अन्दर वादी को जवाब उसके प्रत्युत्तर का दे दे ,परन्तु प्रतिवादी ने एक माह से अधिक समय बीत जाने के उपरांत भी वादी को सुचनाय उपलब्ध नहीं कराई है नगर आयुक्त ,नगर निगम ,गोरखपुर को यह चेतावनी भी दी गयी थी की यदि १५ दिन में सुचनाय न उपलब्ध कराई तो उन पर सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा २० के तहत २५० रुपये प्रतिदिन का दंड अधिरोपित किया जायेगा। इस के बावजूद प्रतिवादी ने न तो दिनांक २०.०८.०७ की तारीख पर उपस्थित हुआ न ही आज की सुनवाई के दौरान आयोग के समक्ष उपस्थित हुआ है।प्रतिवादी का यह आचरण आयोग लापरवाही पूर्ण करार देता है और उस पर सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ की धरा २० के तहत २५० रुपये प्रतिदिन का दंड अधिरोपित करता है जिस की अधिकतम सीमा २५०००/- रुपये तक होगी वाद वास्ते अगली सुनवाई दिनांक ३० अक्टूबर २००७ को पेश हो।
यह की प्रार्थी ने जो नगर निगम गोरखपुर को २२.१०.०७ को जो पत्र लिखा था उसका उत्तर पत्रांक २७६०/ज.सु.अ./कर २००७-०८ दिनांक २७.१०.०७ को देते हुए नगर निगम गोरखपुर ने लिखा है की भवन का स्वामित्व नहीं निर्धारित किया जाता है। मात्र कर अदायगी हेतु नाम दर्ज किया जाता है
कानूनी रूप से परिवार का नाम दर्ज कराने के सम्बन्ध में अवगत कराना है की सक्षम माननीय न्यायलय से स्वामित्व निस्तारण कराये तथा निर्णय की प्रति नगर निगम को प्रस्तुत कराये जिस से अग्रिम कार्यवाही की जा सके।सन १९९६ से आप के ओर से कोई कर नहीं जमा किया गया है।
यह की वादी ने प्रतिवादी नगर निगम के पत्र दिनांक २७.१०.०७ के अनुसार ०८.११.०७ को एक हज़ार रुपये का चेक कर भुगतान के सम्बन्ध में भेजा था मेरे पत्र के अनुसार चेक यह कहकर वापस कर दिया तथा पत्र दिनांक १४.१२.०७ जो मेरे पत्र दिनांक २२.११.०७ के सन्दर्भ में है में उत्तर दिया गया है की जहा तक चेक वापस करने का प्रश्न है जब आप पत्रावली में कुछ है ही नहीं तो चेक रखने का कोई औचित्य है न प्राविधान। इस पत्र को आप अपना अंतिम उत्तर समझेंगे और आप को सलाह दिया जाता है की आप व्यर्थ का पत्राचार उक्त पक्ष पर भी न करे।
१४.१२.०७ पत्र के बाद मैंने १०..०१.०८ को पुनः २ अभिलेशो ०४.०४.८५ के पत्र की छाया प्रतिलिपि परीसिस्ट १ तथा परीशिस्त्त २ रजिस्ट्री रसीद एवं एक्नोलेजमेंट रसीद की छाया प्रतिलिपि के साथ भेज कर सूचना की मांग किया किन्तु हमारे पत्र दिनांक १०.०१.०८ के साथ जो ०४.०४.८५ के पत्र के सम्बन्ध में सूचना मांगी गई थी उस अपने पत्रांक कही भी नगर निगम के भ्रस्त्त अधिकारियो ने खुलासा नहीं किया !
मुझे १५ फ़रवरी २००८ को पत्रांक ज.सु.अ./कर/०७-०८जो लिखा गया है उस में हमारे १०.०१.०८ के पत्र का हवाला तो दिया गया है किन्तु ०४.०४.८५ के राजिस्ट्री रसीद और एकनालेजमेंट का कोई सन्दर्भ नहीं दिया गया है।
राज्य सूचना आयोग के विद्वान मेजर संजय यादव द्वारा हमारे मकान संख्या १८७/१६७ के मामले में जो भ्रस्ट्राचार किया गया है तथा बैमानी से नगर निगम के अधिकारियो और कर्मचारियों के सहयोग से श्रीमती गंगा देवी पत्नी स्वर्गीय यौगेन्द्र नाथ मिश्रा और उन के पुत्र सर्व श्री राजेशकुमार मिश्रा ,जयप्रकाश मिश्रा ,और प्रेम प्रकाश मालिक बन बैठे है उन के सभी चालो का यदि सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ न बना होता तो सिविल कोर्ट में सच्चाई उजागर करने में बरसो बरस लग जाते किन्तु राज्य सूचना आयोग के ईमान दार और विद्वान् आयुक्तों के कलम से नगर निगम गोरखपुर के बईमान अधिकारी कहा बच सकते थे।
नगर निगम गोरखपुर के पत्रांक ९९१ज.सु.अ./२००८/२००९ दिनांक २१.०६.२००८ के अनुसार १७.०२.७१ के अनरजिस्टर्ड बैनामा जो की संपत्ति अंतरण अधिनियम १८८२ की धारा ५४ के विरुद्ध है उस अभिलेश को स्वीकार करने के पूर्व कोई लिखित विधिक राय किसी अधिवक्ता से नहीं ली गई है। और न कोई आवश्यकता थी इस कारन उस की छाया प्रतिलिपि उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा ५४ के बाबत निर्णय देने का अधिकार केवल दीवानी न्यायलय को प्राप्त है उस के बारे में कोई निर्णय या कोई मत नगर निगम द्वारा नहीं दिया जा सकता है । अपने पत्रांक ७५/ज.सु.अ./२००८/२००९ दिनांक २ जून २००८ में लिखा गया है की स्वामित्व का निस्तारण नगर निगम किया ही नहीं जाता है। जब नगर निगम द्वारा स्वामित्व का निस्तारण किया ही नहीं जाता है फिर १९.१२.९६ से लक्ष्मण प्रसाद का नाम काट कर गंगा देवी और उन के पुत्रो का नाम कैसे नगर निगम के इन्तखाब में दर्ज कर दिया गया ?
सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ अभी नया कानून है इस कानून के अंतर्गत पाठको को सही सुचना प्राप्त करने के लिए बरसो बरस विधि व्यवासाईयो को विधि के दाव पेच सिखने पड़ेगे तब जाकर आम जनता इस विशेष अधिनियम का लाभ उठा सकती है। राज्य सूचना आयोगों के समक्ष जब कोई पीड़ित अपने दुःख दर्द की समस्याओ से निदान पाने के लिए आवश्यक सूचना चाहता है तो भ्रस्ट्राचार में महाभारत विशेसज्ञ इधर उधर की सूचना देकर पीड़ित शिकायत करता का आवेदन पत्र ख़ारिज करा देते है या सूचना आयुक्त लिख देते है की वन्न्छित सूचना मिल गई है।
मैंने और मेरे पुत्र श्री विद्या सागर तथा पुत्री सुश्री.सुमन खैरवाल ने धैर्य नहीं खोया ?जो सूचना मैंने और मेरे विधिक प्रतिनिधियों ने केवल २१.०७.०६ से ०७.०१.२०१०के बीच प्राप्त किया है वह सिविल न्यायलय में १० साल में भी नहीं पा सकते थे।
१० दिसंबर २००९ को अपने आदेश में सूचना आयुक्त मेजर संजय यादव ने आदेश दिया की जन सूचना अधिकारी अपर नगर निगम आयुक्त नगर निगम ,गोरखपुर को निर्देशित किया जाता है की वे इस प्रकरण में वांछित सूचनाये वादी को सही उपलब्ध कराये तथा अगली सुनवाई के दौरान स्वयं उपस्थित होकर बताये की सही एवं पूर्ण रूप में सूचनाये उपलब्ध करने हेतु उन के विरुद्ध सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा २० के तहत दंडात्मक कार्यवाही क्यों न की जाये?ऐसा न करने कीदशा में मान लिया जायेगा की उन्हें अपने पक्ष में कुछ नहीं कहना है तथा उन के विरूद्ध दंड अधिरोपित किया जायेगा।मेजर संजय यादव के आदेश के बाद उप नगर आयुक्त नगर निगम ने ७ जनवरी २०१० को जो आदेश किया है वह इस प्रकार है।
यह की उप नगर निगम आयुक्त नगर निगम गोरखपुर के आदेश संख्या ९८८/२न.ज.सु.अ/कर/२००९-२०१० दिनांक ७ जनवरी २०१० के विरूद्ध श्रीमती गंगा देवी और उन के पुत्रो ने सिविल न्यायलय में अपील किया है
जब की १७.०२.७१ के अनरजिस्टर्ड बैनामा के मामले में गोरखपुर पूलिस विभाग ने १५.०६.०९ को श्री मति गंगा देवी और उन के पुत्रो के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा ४२०,४६७,तथा ४६८ के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के मुक़दमा कायम किया गया है। विधिक कार्यवाही के दंड से बचने के लिए एक आखिरी हथियार चलाया है लक्ष्मण प्रसाद लक्ष्मण खैरवाल है ही नहीं !में अपने उसी मकान में पैदा हुआ मेरे बचपन के साथी सर्व श्री विनय सहाय जो राज्यपाल और मुख्यमंत्री के उप सचिव रह चुके है प्रमाण के लिए उन के साथ का फोटो प्रकाशित कर रहा हूँ ।
मेरे मकान के सामने मेरे स्वर्गीय चाचा श्री सरजू प्रसाद का फोटो मेरे मकान के मैदान में लिया गया गया है नीचे दे रहा हूँ ।
मेरे मकान के बगल में (रोज प्रिंटिंग प्रेस )के मालिकान और मेरे पुरे परिवार का फोटो मौजूद है। स्वर्गीय श्याम बिहारी लाल गुप्ता मजिसट्रेट राय गंज ,श्याम बिहारी जी (बिन्दुलाल) रेलवे से सेवा न्रिवत हो गए है। हमारे पडोसी है स्वर्गीय गोकुल चाचा के परिवार तथा मंगरू कहार की पत्नी और पूरा मुहल्ला मुझे बचपन से अब तक जानता है इन लोगो के सामने मुझे किस प्रकार अजनबी साबित कर सकता है।
मेरे स्वर्गीय पिता जी को मोहल्ले के लोग भगत जी के नाम से सम्मान पूर्वक याद करते है उन की स्मृति में आजाद नगर नगर नटखेरा रोड मेरे मकान के सामने लाल दुर्गा जी का मंदिर बना है उसे किसने बनवाया है आँख खोल कर श्री मति गंगा देवी और उन के परिवार माता का दर्शन कर जाय और अपने पापो का प्रायश्चित करने के लिए भगत जी के मकान को खाली कर के चले जाय भगवान् के लाठी में आवाज नहीं होती है उस की मार से कोई बच नहीं पाया है
मेरे घर में मेरे पिता जी का लिखा हुआ वेड मंत्र यदि मिटा न हो तो उसे देख सत्य का मार्ग पकड़ने का प्रयत्न करे कोई धन दौलत,मकान,कार,बंगला साथ नहीं लेकर जाता है कफ़न भी तो साथ नहीं जाता है।
कबीरा जब हम पैदा भये।
जग हँसा हम रोये ॥
ऐसी करनी कर चलो।
हम हसे जग रोये ।।
लक्ष्मण खैरवाल
पत्रकार लेखक एवं श्रम विधि परामर्शी
आज़ाद नगर (लाल दुर्गा मंदिर के सामने )आलम बाग़ ,लखनऊ २२६००५