Lakshman Khairwal(Great Writer,Journalist,&Legal Adviser)

Saturday, May 28, 2011

न्यायायिक सेवा के बहुमूल्य हीरे !

१९५६ से मै श्री उमेशचन्द्र श्रीवास्तव (जस्टिस) जी को देख रहा हूँ । कचहरी रोड महावीर बाबु के निवास से उन का मुंशी लगभग १०-१५ किलो की फाइल का बंडल रिक्शे पर रख कर ०९-१० बजे के बीच हाई कोर्ट की ओर चल देता था।


मै किसी मामले में उनसे सवेरे अगर फतेहगंज से मिलने पहुच जाता तो मुवक्किलों की भीड़ के कारण बात ही नहीं हो पाता था। कभी कभार शेर वाली कोठी के पास बाग़ ऍन बीवी हुसैनगंज में रविवार या किसी विशेष पर्व या त्यौहार पर मुलाकात हो जाती तो १०-०५ मिनट किसी क़ानूनी सवाल पर हम लोग बात कर लेते थे।
मै मजदूरों के कई मुक़दमे में उनकी भरपूर सहायता पाने का गौरव प्राप्त कर चूका हूँ। श्री उमेशचंद श्रीवास्तव जब वकालत छोड़ कर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पद पर विराजमान हुए थे उस समय उनकी मासिक आय ०४-०५ अंको तक पहुच चुकी थी जिस आय को त्याग कर उन्होंने न्याय के मार्ग पर प्रदेश को आगे बढाने में सक्रीय योगदान दिया !


चिनहट और बेल्हा के किसानो के भूमि अधिग्रहण पर मुवाजा भुगतान का उन के निर्णय ने तो किसानो का भाग्य ही बदल दिया।


पी .डब्लू.डी के विरुद्ध मैंने स्वर्गीय गनी बहादुर का मुकदमा किया जो लेबर कोर्ट द्वारा पी.डब्लू.डी को "उद्योग"घोषित
किये जाने के विरुद्ध का उस मुक़दमे ने तो ओद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत सरकारी कर्मचारियों के हित में श्रम न्यायलय का दरवाजा खोल कर मजदूरों पर बड़ा उपकार किया।
आज जब न्यायमूर्तियो के विरुद्ध भ्रस्ट्राचार की हवा बह रही है तो न्यायायिक सेवाओ से जुड़े लोगो को श्री उमेश चंद श्रीवास्तव (जस्टिस) से इमानदारी की सीख लेनी चाहिए।


लक्ष्मण खैरवाल


पत्रकार,लेखक एवं श्रम विधि परामर्शी




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