Lakshman Khairwal(Great Writer,Journalist,&Legal Adviser)

Wednesday, September 1, 2010

सूचना का अधिकार(लक्ष्मण खैरवाल)





सूचना का अधिकार
भारतीय न्याय शास्त्र के चिंतन में एक नया जीवन दर्शन !

लक्ष्मण खैरवाल पत्रकार एवं श्रम विधि परामर्शी (लाल दुर्गा मंदिर के सामने)नटखेडा रोड,आजाद नगर ,आलमबाग ,लखनऊ .




हमारे देश की आम जनता हजारो वर्षो से जो सर के बल खड़ी है उसे पैर के बल पर सीधा खड़ा करने का सूचना का अधिकार एक सार्थक प्रयास है सूचना का अधिकार कानून केवल कानून ही नहीं है बल्कि भारतीय न्याय शास्त्र में चिंतन का एक नया जीवन दर्शन है ।




मुग़लकाल से पूर्व तथा इस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से भारत में अंग्रेजो का प्रवेश तथा अंग्रजो द्वारा भारत की जनता को गुलाम बनाने तथा अपने चाटुकार लेखको, विचार को और संतो के साहित्यों का सहारा लेते हुए युगों युगों से आम जनता को जो मानसिक गुलाम बनाये रखा गया उस मानसिकता को बदलने का सूचना का अधिकार बहुत ही ठोस एवं सक्रिय कदम है जिस कानून का देश के सभी वेर्गो को हृदय से स्वागत करना चाहिए आखिर इस कानून में कौन सी खराबी है जिसका विरोध हमारे न्यायमूर्ति गण कर रहे है सूचना कानून में कुछ दिन पहले ऐसा प्रयास कुछ लोग कर रहे थे की उस के उडने और चलने फिरने के पंख क़तर दिए जाये किन्तु जनता की जाग्रति ने उन की चालो को असफल कर दिया हलाकि वर्तमान सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ एक ऐसा कागजी शेर है जिसके मुह में दात और पंजो में नाख़ून नहीं है केवल गुर्राने से युगों युगों के भ्रस्त्र प्रशाशक ,न्याय पालिका या विधायको के प्रतिनिधयो का चरित्र रातो रात जादू की तरह बदलने वाला नहीं है सूचना के कानून ने अब तक जो महत्वपूर्ण कार्य किया है वह आम जनता और विधि के न्याय शास्त्र में परिवर्तन की एक स्वस्थ हवा चलाया है जिस हवा की आंधी देश के कोने कोने तक ५ वर्षो में पहुच गयी है दाल में नमक के सामान जो लोग देश के उचे उचे पदों पर बैठे है उन्हे आम लोग अब तक जो समझ रहे है की देश की बाग़डोर संभालने वाले ये शक्तिशाली पदों पर बैठे लोग अपने पिछले जनम के अच्छे कर्मो या भगवान द्वारा विशेष कृपा के कारन पैदा किये गए है जिन्हें आम लोगो को अपने आदेश की चभुक से मारने का जनम सिद्ध अधिकार है ऊचे ऊचे पदों पर विराजमान लोगो का आदेश भगवान् या अल्लाह द्वारा दिया गया वरदान है जिन्हें अपने आदेश से देश के ८३ करोड़ ६० लाख लोगो या यु कहिये सभी को तथा कथित कानून के डंडे से मरने का विशेष अधिकार दिया गया है गुलामी के ज़माने में तो देश के सभी लोगो को मार पीट कर बैलो की तरह हकाने का अंग्रेज अधिकारियो को एक छत्र अधिकार प्राप्त था दुनिया भर में जहा जहा अंग्रेजो ने लोगो को गुलाम बना रक्खा था वहा ही जनता कहती थी की जहा से सूरज निकलता है और जिस तरफ जाकर डूबता है उस अंग्रेजी राज को कोई नहीं मिटा सकता है किन्तु देखते ही देखते दुनिया के सभी कोने से अंग्रेजो के राज का सफाया हो गया अब तो अंग्रेजो की हुकूमत अपने ही देश में बद से बदतर हालत में पहुच चुकी है कुछ ही दिनों में आप देखेंगे की अंग्रेजो को अपने ही देश में हुकूमत का तख्ता पलट जायेगा आज दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की बुनियाद हिल रही है कब वह लडखडा कर गिर जाये किसी को पता नहीं है दुनिया के तमाम मेहनत कस लोग अब जान गए है की उनकी ही मेहनत से एक रुपये का माल दस रुपये का किस तरह हो जाता है अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत का जादू सब के सर पर चढ़ कर बोल रहा है ।




गेहू का एक दाना ,धान की एक बीज तथा मिटटी से लोहा और सोना पैदा होता है यह पढ़े और अनपढ़ सभी समझने लगे है गेहू का एक दाना ,कितने गेहू की बाली पैदा करता है तथा धान का एक बीज किस प्रकार हजारो चावल के दाने के रूप में बदल जाता है मिटटी का एक क्र्र्ण किस प्रकार सोना चादी ,लोहे के रूप में बदल जाता है लोहे का इस्पात मिटटी से बदल कर रेल ,हवाई जहाज और न जाने कितने रूप में बदल जाता है लोहे से ट्रक्टर और पानी के ट्यूबेल बना कर दुनिया के लोगो को जीने के लिये फल और अन्न जैसा अमृत किस तरह पैदा करने के लिए आदमी के दो हाथ क्या क्या जादू कर देते है जिस परिवर्तन को आम आदमी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था हजारो वर्षो की गुलामी और लगभग १५० वर्षो के संघर्षो के बाद आजादी हासिल होने के बाद भी हमारी सोच और चिंतन की अवस्था में कोई खास परिवर्तन नहीं आया गुलामी और आज़ादी के काल में हमारी जनता के साथ जो अत्याचार और उत्पीडन हुआ उसके फल स्वरुप हमारी जनता के अन्तः करण से मान सम्मान और मर्यादा की शक्ति लगभग समाप्त हो गई ,इसी कारन आम लोग सभी तरह के अन्याय अपमान शारीरिक यातना सहने के आदि हो गए देश की जन संख्या का एक % से भी कम प्रशासनिक अधिकारी आम जनता को कानून के डंडे से बैल की तरह हाकते है।




विदेसी शासको द्वारा गुलामी और आजादी के संघर्षो के काल में अपने ही देश वासी जो शासन के प्रशासनिक और न्यायायिक सेवा में रहने वाले विशेष लोग जो कुर्सी के लिए ही अपने जीवन को समर्पित कर चुके है वह लोग कितनी निल्र्ज्जता और अनुशासन हीन अनैतिकता पूर्वक जीवन बिताते हुए इस प्रकार आचरण करते है जैसे उन की अवस्था में कभी परिवर्तन होगा ही नहीं।




उनका जीवन छुट्टे सांड की तरह हो गया है वह जो चाहे करे जनता से जैसा भी व्योहार और बर्ताव करे वह सब उनका विशेष अधिकार माना जाता है स्वतंत्रता के बाद जो उन पर काबू रखने वाले जन प्रतिनिधि सांसद ,विधायक ग्राम सभाओ में पंच या सरपंच चुने जो न लगे वह हिंदी के पद चिन्हों पर चल कर आम जनता पर शासन कर अपना जनम सिद्ध अधिकार समझ बैठे प्रजातान्त्रिक शासन पद्दिती के जो खम्भे है यानि विधायिका ,प्रशासनिक सेवा ,न्यायपालिका तथा मीडिया के प्रतिनिधि सभी सुखमय जीवन बिताने के लिए अपने को बेच दिए।




प्रजातान्त्रिक शासन पद्दिती के चारो खम्भे भ्रस्ट्राचार और सुखमय जीवन के लिए बदबूदार कीचड़ की नाली में ऐसा गिर चुके है और जिनमे से किस किस को आप उन बदबूदार नाली से नीकालेगे कौन है जो काल की कोठरी में जाकर बगैर दाग के निकल पाया है सभी के मुह और कपड़ो पर काले धब्बे लगे है पैदल या साइकिल पर चलने में लोगो को शर्म महसूस होती है दाल में नमक के सामान प्रशासनिक सेवा और विधायिका तथा मीडिया के कुछ प्रतिनीधी बचे है जिनकी आवाज ,लेखनी या निर्णय नकार खाने में तूती की आवाज बन कर रह गई है।




हमारे देश में कहावत थी "निंदक निमरे रखिये चन्दन कुटी छवाए " आज़ादी के बाद लगभग दो दशक तक ऐसी प्रथा थी की जो आलोचक यदि किन्ही कारणों से चुनाव में पराजित हो जाते थे उन्हें शासक दल के लोग संसद के स्थान पर राज्य सभा या विधान परिषद् में चुन कर लाते थे ताकि सषक दल की गलतियों को वो उजागर कर सके शासक दल के प्रदेश में और देश में कई ऐसे लोग थे जो मेरे जैसे आलोचक को अपनी सरकार में शामिल होने के लिए जोर देते रहे किन्तु में अपनी समझ और वसूल के कारण अपने जीवन में परिवर्तन के लिए तैयार नहीं हुआ शासक दल के कई मुख्यमंत्री प्रदेश में ऐसे भी रहे है की जिन्होंने मेरी आलोचना के आधार पर कई कानूनों में संशोधन तक करने में नहीं हिचके !




न्यायपालिका में कितने ही ऐसे न्यायमूर्ति रहे है की जो जीवन भर न्याय की कुर्सी के कारण अपने मित्रो और रिश्तेदारों के घर किसी समारोह और त्योहारों तक में मिलने नहीं गए मीडिया और पत्रकारिता के कई ऐसे महान विभूतियों से मेरा व्यक्तिगत सम्बन्ध भाई के समान रहा जो अपने आप को किसी सुख सुविधा के लिए नहीं बदले आज तो मोटर कार या स्कूटर या बाइक पर "प्रेस"लिखने का एक फैशन हो गया है पत्रकार मंत्रियो के साथ चाय या अन्य तरह का पदार्थ पीने में गौरव महसूस करते हुए जब उनके पैर डगमगाने लगते है तो मुहल्ल्लो वालो पर अपना रुतवा ज़माने के लिए लडखडाती जबान से कहते है की तुम्हे नहीं मालूम में अमुक मंत्री जी की पार्टी से आ रहा हूँ।




आम लोगो को नहीं मालूम की हम दैनिक जीवन में जो नमक से लेकर दाल ,चावल,सब्जी आदि खरीदते है उन सभी चीजो पर टैक्स देते है बूँद बूँद से तालाब नहीं समुन्द्र बन जाता है हमारे और आपके द्वारा सरकार को दिया जाने वाला टैक्स जो करोड़ नहीं बल्कि अरबो की संख्या में पहुच जाता है उसी टैक्स के रूपये से राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री ,और मुख्यमंत्री ,न्यायमूर्तियो से लेकर गॉव में जो लाल पगड़ी बांधे जो चौकीदार घूमता है उसका भी वेतन उसी रकम से दिया जाता है देश की सबसे ऊची कुर्सी पर बैठने वाले राष्ट्रपति से लेकर झाड़ू देने वाले सफाई जमादार का वेतन हमारे ही पैसो से दिया जाता है जिस आम जनता के पैसो से इन ऊची ऊची कुर्सी पर बैठने वालो को जब वेतन और सारी सुख सुविधा दी जाती है इसलिए जनता पर शासन करने के बजाये यह सभी जनता के सेवक ही तो है !जब हमारे ही पैसो से सब को सब सुख सुविधा मिलती है फिर उस का हिसाब हमें मांगने पर अधिकार क्यों नहीं है आज दुनिया भर में जो परिवर्तन की हवा चल रही है उस हवा से हमारा देश कैसे बच सकता है आज अरब के देश में जहा चोरी या बलात्कार के लिए गर्दन काट दिया जाता था वह मानवता के अधिकार की हवा पहुच चुकी है लोग अपने विचारो और रीती रिवाजो में परिवर्तन कर रहे है।




यदि १८ वी सदी के काल में सूचना का अधिकार बना होता तो राजा महाराजा ,लाल पगड़ी वाले चौकीदारों से लेकर दरोगा तक में कोई सवाल करता तो उसका गर्दन काट दिया जाता।




दुनिया में चलने वाली इस परिवर्तन की हवा को हमारे कर्णधार क्यों नहीं समझ पा रहे हैहमारी जनता कौन सी गलती कर रही है जो अपने दिए हुए पैसो का हिसाब इन ऊचे ऊचे पदों पर बैठे लोगो से माग रही है आम लोग अपने दुःख दर्द के सम्बन्ध में जो प्रार्थना पत्र या मुक़दमा न्यायालयों में प्रस्तुत करते है उसकी कार्यवाही के बारे में जो सूचना मांगते है उसके लिए उन्हें क्यों रोका जाता है तथा उनसे बदला लेने के लिए उनके खिलाफ पुलिस के द्वारा या अन्य कार्यवाही के द्वारा उन्हें प्रताड़ित क्यों किया जाता है ।




सूचना का आधिकार अधिनियम केवल कानून ही नहीं है बल्कि युगों युगों से चली आ रही मानसिक दस्ता से मुक्ति का एक दर्शन है।






लक्ष्मण खैरवाल
पत्रकार एवम श्रम विधि परामर्शी
लाल दुर्गा मंदिर के सामने, नट खेडा रोड
आजाद नगर ,आलमबाग़ ,लखनऊ
नोट: पाठक गण से निवेदन हे की आप अपना सुझाव और आलोचना हमारे पते पर भेजने की कृपा करेगे।































































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